रे मन वृन्दाविपिन निहार।
यद्पि मिले कोटि चिंतामणि तदपि न हाथ पसार॥ [1]
विपिन राज सीमा के बाहर हरिहूँ को न निहार।
जय श्री भट्ट धूरि धूसर तन, यह आसा उर धार॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक
हे मन! तू केवल श्री वृन्दावन की ओर ही निहार। यदि तुझे करोड़ों चिंतामणि (इच्छा पूर्ण करने वाले रत्न) भी मिलें, तब भी तू उनके लिए हाथ मत फैलाना। [1]
इस वनराज (वृन्दावन) की सीमा के बाहर यदि साक्षात् श्री हरि भी विराजमान हों, तो तू उनकी ओर भी मत देखना। श्री भट्ट जी कहते हैं कि अपने हृदय में बस यही एक आशा धारण कर कि तेरा शरीर सदा इस पावन रज (धूल) से धूसरित रहे। [2]
हे मन! तू केवल श्री वृन्दावन की ओर ही निहार। यदि तुझे करोड़ों चिंतामणि (इच्छा पूर्ण करने वाले रत्न) भी मिलें, तब भी तू उनके लिए हाथ मत फैलाना। [1]
इस वनराज (वृन्दावन) की सीमा के बाहर यदि साक्षात् श्री हरि भी विराजमान हों, तो तू उनकी ओर भी मत देखना। श्री भट्ट जी कहते हैं कि अपने हृदय में बस यही एक आशा धारण कर कि तेरा शरीर सदा इस पावन रज (धूल) से धूसरित रहे। [2]

