श्रीराधा वल्लभ-लाड़िली, अति उदार सुकमारि।
“ध्रुव” तौ भूल्यौ ओर ते, तुम जिनि देहु बिसारि॥ [1]
तुम जिनि देहु बिसारि, ठौर मोकौं कहुँ नाहीं।
पिय सँग-भरी कटाक्ष, नेकु चितवौ मो माहीं॥ [2]
बढ़ै प्रीति की रीति, बीच कछु होइ न बाधा।
तुम हौ परम प्रवीन, प्रान-वल्लभ श्रीराधा॥ [3]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुंडलियां (15)
प्रियतम की लाड़-गहेली उदार शिरोमणि सुकुमारी हे श्री राधे ! आपका यह 'ध्रुवदास' अनादिकाल से ही आपको भूला हुआ है, किन्तु आप इसे मत भुला देना। [1]
यदि आप भी इसे भूला देंगी तो फिर इसे अन्यत्र कहीं कोई स्थान ही नहीं है, अतएव प्रियतम के प्रेम से छकी हुई रसभरी चितवन से अपने ध्रुवदास को अपनी कृपामयी दृष्टि द्वारा कृतार्थ कीजिए। [2]
जिससे आपके चरणों में निरन्तर प्रीति की वृद्धि होती रहे एवं आपकी कृपा में आने वाली समस्त बाधाएँ निवृत्त हो जाएँ। हे प्रिया ! आप तो प्रवीण एवं निपुण हैं, श्री कृष्ण की प्राण हैं, कृपया मेरे बारे में विचार कीजिये। [3]
“ध्रुव” तौ भूल्यौ ओर ते, तुम जिनि देहु बिसारि॥ [1]
तुम जिनि देहु बिसारि, ठौर मोकौं कहुँ नाहीं।
पिय सँग-भरी कटाक्ष, नेकु चितवौ मो माहीं॥ [2]
बढ़ै प्रीति की रीति, बीच कछु होइ न बाधा।
तुम हौ परम प्रवीन, प्रान-वल्लभ श्रीराधा॥ [3]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुंडलियां (15)
प्रियतम की लाड़-गहेली उदार शिरोमणि सुकुमारी हे श्री राधे ! आपका यह 'ध्रुवदास' अनादिकाल से ही आपको भूला हुआ है, किन्तु आप इसे मत भुला देना। [1]
यदि आप भी इसे भूला देंगी तो फिर इसे अन्यत्र कहीं कोई स्थान ही नहीं है, अतएव प्रियतम के प्रेम से छकी हुई रसभरी चितवन से अपने ध्रुवदास को अपनी कृपामयी दृष्टि द्वारा कृतार्थ कीजिए। [2]
जिससे आपके चरणों में निरन्तर प्रीति की वृद्धि होती रहे एवं आपकी कृपा में आने वाली समस्त बाधाएँ निवृत्त हो जाएँ। हे प्रिया ! आप तो प्रवीण एवं निपुण हैं, श्री कृष्ण की प्राण हैं, कृपया मेरे बारे में विचार कीजिये। [3]

