लखी जिन लाल की मुसक्यान - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (40)

लखी जिन लाल की मुसक्यान - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (40)

लखी जिन लाल की मुसक्यान ,
रसिक भगवत दृग दई असि, ऐंचि कै मुख म्यान ||

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (40)

भगवत रसिकजी कहते हैं कि रसिक लालजी ने यही मुस्कान रूपी तलवार मुख रूपी म्यान से निकालकर हमारे नेत्रों में (ऐसी) मार दी है कि अब इस मुस्कान को देखते रहने के अलावा और हम किसी काम के नहीं रह गये हैं।