मोह-फाँस जग बँधि रह्यौ - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (34)

मोह-फाँस जग बँधि रह्यौ - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (34)

मोह-फाँस जग बँधि रह्यौ, बिष्ठुरे करत बिलाप ||
बिछुरे करत बिलाप, मानि सुत, पितु, पति, माता |
ससुर, जमाई, जुबति, सुहृद, गुरु, सिष, धन, भ्राता
निज अनुभव की भूल, बिभव भगवत बिरमाये |
को हम, कहँ को जात, कहाँ ते, किहि लगि आये ||

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (34)

भावार्थ - प्राणी इस संसार में न तो किसी के साथ आये हैं और न (इस संसार से) किसी के साथ गये हैं। (सब अकेले पैदा होते हैं और अकेले ही मरते हैं।) यह मिलाप तो यहीं संसार यात्रा में हो गया है। दुनिया ममता के जाल में फँसी है, इसीलिए लोग पिता, पुत्र, माता, ससुर, जमाई पत्नी, मित्र, गुरु, शिष्य, धन, भाई बंधु आदि को अपना मानकर उनसे बिछुडने पर विलाप करते हैं। गुरु तो नित्य हैं श्यामा श्याम का ही स्वरूप है। भगवतरसिक जी कहते हैं कि लोग अनुभव की कमी के कारण संसार के सुखभोग में ऐसे सुध बुध खोये हैं कि हम कौन हैं, कहा जा रहे हैं, कहाँ से आये हैं, किसलिए आये है, आदि बातों का इन्हें होश ही नहीं है।