"जहाँ जहाँ राधा प्यारी धरति चरन पिय,
तहाँ तहाँ नैननि के पाँवड़े बनावहीं || "
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रिंगार शत द्वितीय खंड (28)
तहाँ तहाँ नैननि के पाँवड़े बनावहीं || "
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रिंगार शत द्वितीय खंड (28)
जहाँ जहाँ राधा प्यारी अपने सुकोमल चरणों को स्थापित करती चलती हैं, वहां वहां रसिक प्रियतम श्री कृष्ण अपनी आँखों की पलके बिछाते रहते है।

