हमारे वृन्दावन उर ओर |
माया काल तहाँ नहिं ब्यापै, जहाँ रसिक सिरमौर ||
टूटि जात सत असत बासना, मन की दौरा दौर |
भगवत रसिक बतायौ श्रीगुरु, अमल अलौकिक ठौर ||
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (41)
माया काल तहाँ नहिं ब्यापै, जहाँ रसिक सिरमौर ||
टूटि जात सत असत बासना, मन की दौरा दौर |
भगवत रसिक बतायौ श्रीगुरु, अमल अलौकिक ठौर ||
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (41)
हमारे हृदय में श्रीवृन्दावन का स्वरूप विराजमान है अर्थात मानो हमारा हृदय प्रकट वृन्दावन स्वरूप ही है । जहाँ हमारे रसिक शिरोमणि श्रीश्यामा कुंजविहारी सतत विहार करते रहते हैं, माया और काल भूल कर भी वहां नहीं आ सकते। (यहाँ पहुँचकर) मन की अनसुलझी सत्य एवं असत्य की बीमारी एवं वासनाएं खत्म हो जाती हैं, और यहाँ वहां की अनियन्त्रित दौड़ें स्वयं टूट जाती है। भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमें ऐसा निर्मल एवं अलौकिक स्थान अर्थात वृन्दावन हमारे श्रीगुरुजी महाराज ने बताया है।

