नागरता की रासि किसोरी -  श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (82)

नागरता की रासि किसोरी - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (82)

(राग केदारौ) [शय्या समय]
नागरता की रासि किसोरी।
नव नागर कुल मौलि साँवरौ, वर बस किया चिते मुख मोरी।।
रूप रुचिर अँग अँग माधुरी, बिनु भूषन भूषित ब्रज गोरी।
छिन छिन कुसल सुधंग अंग में, कोक रभस रस सिंधु झकोरी।।
चंचल रसिक मधुप मोहन मन, राखे कनक कमल कुच कोरी।
प्रीतम नैन जुगल खंजन खग, बॉधे विविध निबंधनि डोरी ।।
अवनी उदर नाभि सरसी में, मनौं कछुक मदिक मधु घोरी।
(जे श्री) हित हरिवंश पिवत सुंदर वर, सींव सुदृढ़ निगमनि की तोरी।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (82)


भावार्थ- किशोरी राधिका सुन्दरता की राशि हैं। इन्होंने नव नागर समूह के भी सिरमौर श्याम सुन्दर को अपनी चितवन और ललितभाव से मुख मोड़ने की क्रिया से ही वश में कर लिया है। इनका रूप अत्यन्त रुचिर है और अङ्ग अङ्ग में माधुर्य है। ये व्रज गोरी विना भूषणों के ही भूषित है अर्थात् अत्यन्त रमणीय है। यह सुधङ्ग नृत्य के प्रत्येक अङ्ग में कुशल तो है ही अपितु एकान्तिक कोक विलास के रस समुद्र में भी प्रतिक्षण सराबोर सी हैं। इन्होंने परम चञ्चल रसिक मन मोहन भ्रमर के मन को अपने कनक जैसे कुच कमलो की कोर से ही अटका लिया है और प्रियतम के युगल नयन खञ्जन पक्षियों को भी (अपने रूप माधुर्य्य आदि) अनेक बन्धन डोरियों से बाँध रखा है।श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते है इन परम सौन्दर्य मयी श्रीराधा ने अपने उदर रूप भूमि में स्थित नाभि कुण्डिका में कुछ एक मधुर एवं मादक रस घोल रखा है, जिसे सुन्दर शिरोमणि श्रीलालजी वेदों की भी सुदृढ़ मर्यादा-सीमाओं को तोड़कर उल्लंघन करके पी रहे हैं।