एक आस एक वास करि - श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (598)

एक आस एक वास करि - श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (598)

एक आस एक वास करि, एकै इष्ट उपास।
श्रीबिहारीदास अनन्य मत, बड़ौ भजन विस्वास॥

- श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (598)

अपने हृदय में केवल एक ही आसरा रखो, एक ही धाम का आश्रय लें और एक ही इष्टदेव का अनन्य भजन करें। श्रीबिहारिनदेवजी का परम सिद्धांत है कि जब साधक एकनिष्ठ होकर अनन्य भाव से भजन करता है और श्रीयुगल-सरकार के चरणों में पूर्ण विश्वास रखता है, तब उसके हृदय में दिव्य प्रेम-रस की निरंतर वृद्धि (वर्धन) होती रहती है।