प्रेम समुद्र रूप रस गहरे - ललिता अवतार श्री हरिदास, अष्टादश पद (18)

प्रेम समुद्र रूप रस गहरे - ललिता अवतार श्री हरिदास, अष्टादश पद (18)

"प्रेम समुद्र रूप रस गहरे, कैसे पाऊँ थाह ||"
- ललिता अवतार श्री हरिदास 

प्रेम और रूप के अगाध महासागर (अर्थात "श्री बिहारी जी") की गहराई को नापना सर्वदा असंभव है |