कालिन्दी-कूल-कल्प-द्रुम-तल निलय प्रोल्लसत्केलिकन्दा, वृंदातव्यं सदैव प्रकटतर रहो बल्लवी भाव भयो |
भक्तानां हृतसरोजे मधुर रस-सुधा-स्यंदि पादारविन्दा, सान्द्रानन्दा कृति र्नः स्फुरतु नव-नव-प्रेमलक्ष्मी रमन्दा ||
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु - राधा सुधा निधि - 126
भक्तानां हृतसरोजे मधुर रस-सुधा-स्यंदि पादारविन्दा, सान्द्रानन्दा कृति र्नः स्फुरतु नव-नव-प्रेमलक्ष्मी रमन्दा ||
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु - राधा सुधा निधि - 126
जो कालिन्दी- कूल-वर्ती कल्पद्रुम तल-स्थित भवन में उल्लसित केलि-विलास की मूल स्वरूप हैं, जो श्री वृन्दावन में सदा-सर्वदा प्रकटतर रूप से विराजमान् हैं, एकान्त सहचरी ललितादिकों के भावों से भव्य (सुन्दर) हैं अर्थात् परम सुन्दरी हैं एवं जो भक्तों के हृदय-कमल में अपने चरणारविन्दों का स्थापन करके मधुर-रस-सुधा का निर्वाहन करती हैं वे घनीभूत आनन्द-मूल नित्य अभिनवपूर्ण प्रेमलक्ष्मी (श्रीराधा) मेरे हृदय में स्फुरित हों।

