(राग भैरो)
अद्भुत रस की खानि, सदा सुखदानि बिहारिनि रानी।
अद्भुत रस की खानि, सदा सुखदानि बिहारिनि रानी।
जीवन मूरि बिहारी कौ धन, वृन्दावन रजधानी॥
आदि न अंत, सनातन, अबिचल, सहज सुभाव सुमानी।
नागरि अति सुकुमारि, नवल नित रसिक सिरोमणि जानी॥
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20.1)
भगवत रसिक जी के शब्दों में नित्य सुख देने वाली निकुंजेश्वरी श्रीकिशोरी जी नित्य विहार रस की विलक्षण खान है। (सामान्य खाने, खनिज निकालते निकालते एक दिन रिक्त हो जाती हैं, किंतु ये निरंतर रस बरसाती हुई भी सदा रस से भरी रहती हैं)। ये बिहारी जी महाराज की जीवन संजीवनी है। उनके प्राणों का धन हैं। नित्य वृन्दावन इनकी रजधानी है। इन किशोरी जी का न आदि है न अंत। ये तो सनातन और टहल हैं। ये सहज स्वाभाविक मानवती हैं। (नैमितिमक मान इनमें नहीं है। ये बड़ी ही सुकुमार हैं और नित्य नवनवायमान स्वरूप से विद्यमान रहती हैं। श्री बिहारी जी महाराज ही इनके स्वरूप को नित्य पहचानते हैं ।

