(कवित्त)
प्यारीजू की मुसकनि, बीजुरी सी कौंधी जाति,
प्यारे जू के उर तैं न रेखा सी टरति है। [1]
भरि-भरि आवैं नैन, केसेहूँ न पावैं चैन,
बान की सी अनी हियैं खरक्यौ करति है॥ [2]
लाडिली नवेली अलबेली खानि माधुरी की,
सहज सुभाईनि में सर्वसु हरति है। [3]
हित ध्रुव नये-नये छवि के तरंग देखैं,
रीझि सीस-चन्द्रिका पगनि कौं ढरति है॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (33)
प्यारीजू की मुसकनि, बीजुरी सी कौंधी जाति,
प्यारे जू के उर तैं न रेखा सी टरति है। [1]
भरि-भरि आवैं नैन, केसेहूँ न पावैं चैन,
बान की सी अनी हियैं खरक्यौ करति है॥ [2]
लाडिली नवेली अलबेली खानि माधुरी की,
सहज सुभाईनि में सर्वसु हरति है। [3]
हित ध्रुव नये-नये छवि के तरंग देखैं,
रीझि सीस-चन्द्रिका पगनि कौं ढरति है॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (33)
श्री प्रिया जू की मुस्कान विद्युत की भांति अत्यंत चमत्कृतपूर्ण है, जो प्रियतम के हृदय में एक रेखा की तरह खिंच जाती है और हटाए नहीं हटती, अर्थात कभी विस्मृत नहीं होती। [1]
इस मुस्कान के प्रभाव से श्रीकृष्ण के नेत्र सदैव सजल और व्याकुल बने रहते हैं; उनका मन एक पल को भी कहीं विश्रांति का अनुभव नहीं करता। वही सरस मुस्कान उनके हृदय में बाण की नोक के समान निरंतर चुभती रहती है। [2]
नित्य नए रूप-लावण्य से युक्त, अलबेली लाडिली बाला सौंदर्य-माधुर्य की निधि हैं, जो अपनी सहज भाव-भंगिमाओं से प्रियतम का सर्वस्व अपहरण करती रहती हैं। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रिया-छवि-सिंधु की नित्य नई तरंगों का दर्शन करते हुए, प्रियतम के शीश पर विराजित मयूर-पंख रीझ-रीझ कर प्रिया के श्री चरणों की ओर ढलता रहता है। [4]

