बसीवो श्री वृन्दावन को नीकौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त के पद (185)

बसीवो श्री वृन्दावन को नीकौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त के पद (185)

(राग कलिंगडा)
बसीवो श्री वृन्दावन को नीकौ,
छिन्न छिन्न प्रति अनुराग बढ़त दिन, दरस बिहारीजी कौ ॥ [1]
नैंन श्रवण रसना रस अँचवत, अंग संग प्यारी पी कौ |
श्री बिहारी बिहारिनि दासी, अंग संग बिछुरत नाहीं कौ ॥ [2]

- श्री बिहारिन देव - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त के पद (185)

श्री वृन्दावन में निवास करना अत्यंत सुंदर है। प्रत्येक क्षण श्री बिहारीजी के दर्शन से प्रेम निरंतर बढ़ता रहता है। [1]

नेत्र, कान और जिह्वा श्री राधा-कृष्ण के रूप, वाणी और स्वाद का रस लेते रहते हैं। श्री बिहारिन देव कहते हैं कि वृन्दावन की कृपा से वह जीव बिहारी बिहारिन की दासता को प्राप्त कर उनसे एक क्षण भी विलग नहीं रहता। [2]