यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 6 (6)

यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 6 (6)

यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित, प्राण करै बलिहारी।
भगवत रसिक पियत या रस को, और लगे सब खारी॥

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 6 (6)

हे सखी, "नित्य विहार" के अमृत रस को देखो और अपने प्राण-जीवन को इस रस पर न्यौछावर कर दो। श्री भगवत रसिक कहते हैं कि "नित्य विहार" का रस प्राप्त कर अन्य सभी प्रकार के सुख निकृष्ट दिखते हैं।