बनी श्रीराधा मोहन की जोरी  - श्री हित हरिवंश , हित चतुरासी (09)

बनी श्रीराधा मोहन की जोरी - श्री हित हरिवंश , हित चतुरासी (09)

(राग बिलावल)
बनी श्रीराधा मोहन की जोरी।
इंद्र नील मनि स्याम मनोहर, सात कुंभ तनु गोरी।।
भाल बिसाल तिलक हरि, कामिनि चिकुर चंद्र बिच रोरी।
गज नाइक प्रभु चाल, गयंदनि गति वृषभानु किसोरी।।
नील निचोल जुवति, मोहन पट पीत अरुन सिर खोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति, सुरत रंग में बोरी।।

श्री हित हरिवंश , हित चतुरासी (09)

भावार्थ-अति अनुपम जोड़ी है श्री राधा मोहन की। मनोहर श्याम सुन्दर इन्द्र नील मणि की भाँति हैं। तो वृषभानु किशोरी श्रीराधा काञ्चन तनु हैं।लाल के विशाल भाल पर तिलक शोभित है, तो कामिनि प्रिया की केश चन्द्रिका के मध्य (माँग) में रोरी लसित है। मोहन लाल की गति (चाल) मत्त गजराज जैसी मोहक और श्रीवृषभानु नन्दिनी की मत्त करिणी जैसी मद मथर है।नव तरुणि श्रीराधा के श्रीअंग में नीलाम्बर शोभित हैं और श्याम सुन्दर के श्यामाङ्ग पर पीत कौशेय धारण है। उपरोक्त नख शिख शृङ्गार की पूर्णता शिरोभाग पर लसित अरुण खोरी (छोर) कर रहा है। श्रीहित हरिवंश कहते हैं यह जोड़ी सौन्दर्थ्य एवं रस की सीमा है। राधापति श्रीकृष्ण रसिक चूडामणि हैं और श्रीराधा सूरत रस सिन्धु रूपा हैं जो रसिकों को नित्य रस देती हैं ।