(राग भैरवी)
प्यारी जू अपनी ओर चितैयै।
नित्य निकुंज विलास आपनो इन नैनन दरसये॥
ललित किशोरी अगुननगीना हाहा मत परशैये।
ज्यों तन वस्यो निरंतर श्रीवन त्यों मन वेगी बसैये॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी (263)
श्री ललित किशोरी कहते हैं, हे प्यारी जू ! कृप्या मुझे किसी भी तरह अपना बना लें (अर्थात मेरे हृदय को अपने चरण कमलों में ले )। कृप्या मुझे आशीर्वाद दें जिससे कि मैं आपकी निकुंज लीला को इन नैनों में देखता रहूँ। श्री ललित किशोरी विनम्रता में कहते हैं, हे किशोरी जी ! आप करुणामयी हैं, मेरे दोषों को अनदेखा करो और जैसे मेरा शरीर वृंदावन में रहता है, वैसे ही मेरा मन भी दिव्य वृंदावन में बसा दो।
प्यारी जू अपनी ओर चितैयै।
नित्य निकुंज विलास आपनो इन नैनन दरसये॥
ललित किशोरी अगुननगीना हाहा मत परशैये।
ज्यों तन वस्यो निरंतर श्रीवन त्यों मन वेगी बसैये॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी (263)
श्री ललित किशोरी कहते हैं, हे प्यारी जू ! कृप्या मुझे किसी भी तरह अपना बना लें (अर्थात मेरे हृदय को अपने चरण कमलों में ले )। कृप्या मुझे आशीर्वाद दें जिससे कि मैं आपकी निकुंज लीला को इन नैनों में देखता रहूँ। श्री ललित किशोरी विनम्रता में कहते हैं, हे किशोरी जी ! आप करुणामयी हैं, मेरे दोषों को अनदेखा करो और जैसे मेरा शरीर वृंदावन में रहता है, वैसे ही मेरा मन भी दिव्य वृंदावन में बसा दो।

