चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नहीं,
सखी लड़ैती लाल की रहें, महल के माहीं ||
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (40)
श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में वह न किसी के चेला हैं, और न गुरु हैं वह केवल निज महल में श्री लाड़ली लाल को दिन रात लाड लड़ाती हैं |
सखी लड़ैती लाल की रहें, महल के माहीं ||
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (40)
श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में वह न किसी के चेला हैं, और न गुरु हैं वह केवल निज महल में श्री लाड़ली लाल को दिन रात लाड लड़ाती हैं |

![चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नहीं - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (40)](https://images.brajrasik.org/5b1260359f7ab760360f9c76-m.jpeg)