केनापि नागरवरेण पदे निपत्य, संप्राथितैक परिरम्भ रसोत्सवायाः |
सभ्रूविभङ्गम अतिरंग निधेः कदा ते, श्रीराधिके नहिनहीति गिरः शृणोमि ||
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि 09
हे श्री राधिके कोई चतुर-शिरोमणि किशोर आपके श्री चरणों में बारम्बार गिरकर आपसे परिरम्भण सुखोत्सव की याचना कर रहे हों और आप अपनी भ्रूलताओं को विभंगित कर-करके परम रसमय वचन 'नहीं नहीं' ऐसा कह रही हों। हे अति कौतुक-निधि मैं आपके इन शब्दों को कब सुनुँगी।
सभ्रूविभङ्गम अतिरंग निधेः कदा ते, श्रीराधिके नहिनहीति गिरः शृणोमि ||
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि 09
हे श्री राधिके कोई चतुर-शिरोमणि किशोर आपके श्री चरणों में बारम्बार गिरकर आपसे परिरम्भण सुखोत्सव की याचना कर रहे हों और आप अपनी भ्रूलताओं को विभंगित कर-करके परम रसमय वचन 'नहीं नहीं' ऐसा कह रही हों। हे अति कौतुक-निधि मैं आपके इन शब्दों को कब सुनुँगी।

