जा रज सौं जग रज कहै, सो रज कज है जाइ।
साँची रजहि न सेवहीं, श्री वृन्दावन आई॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (333)
साधारणतः यह जीव संसारी माया और नश्वर सुखों की खोज में भटकता हुआ अथक प्रयास करता है। वह केवल उस माया-रूपी रज (धूल) का ही संचय करता है, जो उसके मिथ्या अहंकार को पुष्ट करती है। रसिक जन कहते हैं कि जो इस दिव्य रज (ब्रज-धुलि) को संसार की साधारण रज कहता है, उसकी बुद्धि का नाश हो जाता है। जिस वृन्दावन रज के सेवन मात्र से परम दिव्य प्रेमानंद की प्राप्ति होती है, दुर्भाग्यवश यह जीव उसकी महिमा को न जानकर उससे विमुख रहता है।
साँची रजहि न सेवहीं, श्री वृन्दावन आई॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (333)
साधारणतः यह जीव संसारी माया और नश्वर सुखों की खोज में भटकता हुआ अथक प्रयास करता है। वह केवल उस माया-रूपी रज (धूल) का ही संचय करता है, जो उसके मिथ्या अहंकार को पुष्ट करती है। रसिक जन कहते हैं कि जो इस दिव्य रज (ब्रज-धुलि) को संसार की साधारण रज कहता है, उसकी बुद्धि का नाश हो जाता है। जिस वृन्दावन रज के सेवन मात्र से परम दिव्य प्रेमानंद की प्राप्ति होती है, दुर्भाग्यवश यह जीव उसकी महिमा को न जानकर उससे विमुख रहता है।

