तजि के रसिक अनन्यता - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (100)

तजि के रसिक अनन्यता - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (100)

तजि के रसिक अनन्यता, विधि निषेध दे घेरि।
व्यासदास के भाव ते, भक्ति गई दै टेरी॥

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, साखी (100)

परम रसिक श्री हरिराम व्यासजी का मत है कि जब कोई साधक रसिकों द्वारा निरूपित श्रीराधारानी की उस मधुर अनन्य भक्ति का परित्याग कर, केवल शास्त्रोक्त विधि-निषेध और कर्मकांडों के जाल में ही अपना बहुमूल्य समय नष्ट कर देता है, तब परा-भक्ति (प्रेम-भक्ति) उस जीव से विमुख हो जाती है और उसके हृदय से प्रस्थान कर जाती है।