ऐसी गति ह्वै है कबहुँ, मुख निसरत नहीं बैन।
देखि देखि वृन्दाविपिन, भरि भरि ढ़ारै नैन॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (95)
देखि देखि वृन्दाविपिन, भरि भरि ढ़ारै नैन॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (95)
हे स्वामिनी! मेरे जीवन में वह अलौकिक क्षण कब आएगा, जब श्रीवृन्दावन की दिव्य छटा का दर्शन करते-करते मेरे नेत्रों से अविरल प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगेगी? कब मेरा चित्त श्रीयुगल-सरकार की रसमय प्रेम-लीलाओं के गंभीर चिंतन में ऐसा निमग्न होगा कि कंठ अवरुद्ध हो जाए और मुख से एक शब्द भी न निकल सके?

