वेणु: करानञि पतित: स्खलितं शिखंडं, भ्रष्टं च पीतवसनं व्रजराज सूनो: |
यस्या: कटाक्ष शरपात विमूर्छितस्य, तां राधिका परिचारमि कदा रसेन ||
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (38)
जिनके नयन बाणों की चोट से श्री ब्रजराज कुमार की मुरली हाथ से छूट गिरती है। सिर का मोर मुकुट खिसक चलता है और पीताम्बर भी स्थान च्युत हो जाता है, यहाँ तक की वह मूर्छित होकर गिर ही पड़ते हैं एक कटाक्ष से, अहा क्या मैं कभी ऐसी श्रीराधिका की प्रेम पूर्वक सेवा करुँगी ?
यस्या: कटाक्ष शरपात विमूर्छितस्य, तां राधिका परिचारमि कदा रसेन ||
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (38)
जिनके नयन बाणों की चोट से श्री ब्रजराज कुमार की मुरली हाथ से छूट गिरती है। सिर का मोर मुकुट खिसक चलता है और पीताम्बर भी स्थान च्युत हो जाता है, यहाँ तक की वह मूर्छित होकर गिर ही पड़ते हैं एक कटाक्ष से, अहा क्या मैं कभी ऐसी श्रीराधिका की प्रेम पूर्वक सेवा करुँगी ?

