रसिक अनन्य की सभा, करमठ कृपन खिंसियांहिं।
आनत नित्य विहार में, खिसलि बाहिरि जाहिं॥
- श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (213)
आनत नित्य विहार में, खिसलि बाहिरि जाहिं॥
- श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (213)
युगल के अनन्य रसिकों की सभा में कर्मकांडी लालची-लोग लज्जित हो जाते हैं, क्योंकि जहाँ प्रेम की प्रधानता में श्रीश्यामा-श्याम के नित्य-विहार की चर्चा होगी, तो भला वह कर्म-धर्म की चर्चा करने वालों को कहाँ जँचेगी? और वे खिसियाकर सभा से मानो बाहर चले जाएँगे।

