कोटि कोटि हीरा रतन, अरु मणि विविध अनेक।
मिथ्या लालच छाँड़ि कै, गहि वृन्दावन एक॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (64)
मिथ्या लालच छाँड़ि कै, गहि वृन्दावन एक॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (64)
करोड़ों-करोड़ों रत्नादिक, विविध मणि-रूपी जड़ सम्पत्ति का झूठा लोभ त्यागो, केवल एक श्री वृन्दावन को ग्रहण करो।

