(राग गौरी)
कहा कहौं इन नैंननि की बात |
ये अलि प्रिया बदन अम्बुज रस अटके अनत न जात।।
जब जब रुकत पलक सम्पुट लट अति आतुर अकुलात |
लंपट लव निमेष अंतर ते अलप-कलप सत सात ||
श्रुति पर कंज दृगंजन कुच बिच मृग मद है न समात |
(जै श्री ) हित हरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात ||
-श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (60)
भावार्थ - श्री लालजी अपनी प्रिय सखी हित सजनी से कहते है - सखी, मैं अपने इन नयनों की क्या बात कहूँ ? ये मेरे नयन भ्र्मर श्रीप्रिया मुख कमल के रस में अटक कर अब अन्यत्र कहीं जाते ही नहीं। जब जब कभी ये नयन पलक सम्पुट में अलक लटों के कारण अन्तराय (विक्षेप ) प्राप्त करते हैं, तब तब अत्यन्त आतुर होकर घबरा उठते है। ये रस लोलुप (नेत्र) लव निमेष काल के अन्तर से भी कम अन्तर को सैकड़ो कल्पों के समान अनुभव करते है।”
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (श्रीलालजी के नयन श्रीप्रियाजी के) कानों में कमल (आभूषण बनकर) आँखों में अंजन और कुचों के बीच में मृग मद बन कर भी नहीं समाते) अथार्त शांति तो पाते नहीं वंर उनके ह्रदय में रूप और प्रेम की तृषा बढ़ती ही रहती है। ) इसलिये श्याम वपु श्रीलालजी उनकी नाभि सरोवर के जलचर मीन बन जाने की याचना कर रहे हैं, (ताकि निरन्तर मीन वृति से श्रीप्रियाजी का रूप रस पान करने के लिये मिला करे, वह मेरा जीवन ही बन गया।)
कहा कहौं इन नैंननि की बात |
ये अलि प्रिया बदन अम्बुज रस अटके अनत न जात।।
जब जब रुकत पलक सम्पुट लट अति आतुर अकुलात |
लंपट लव निमेष अंतर ते अलप-कलप सत सात ||
श्रुति पर कंज दृगंजन कुच बिच मृग मद है न समात |
(जै श्री ) हित हरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात ||
-श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (60)
भावार्थ - श्री लालजी अपनी प्रिय सखी हित सजनी से कहते है - सखी, मैं अपने इन नयनों की क्या बात कहूँ ? ये मेरे नयन भ्र्मर श्रीप्रिया मुख कमल के रस में अटक कर अब अन्यत्र कहीं जाते ही नहीं। जब जब कभी ये नयन पलक सम्पुट में अलक लटों के कारण अन्तराय (विक्षेप ) प्राप्त करते हैं, तब तब अत्यन्त आतुर होकर घबरा उठते है। ये रस लोलुप (नेत्र) लव निमेष काल के अन्तर से भी कम अन्तर को सैकड़ो कल्पों के समान अनुभव करते है।”
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (श्रीलालजी के नयन श्रीप्रियाजी के) कानों में कमल (आभूषण बनकर) आँखों में अंजन और कुचों के बीच में मृग मद बन कर भी नहीं समाते) अथार्त शांति तो पाते नहीं वंर उनके ह्रदय में रूप और प्रेम की तृषा बढ़ती ही रहती है। ) इसलिये श्याम वपु श्रीलालजी उनकी नाभि सरोवर के जलचर मीन बन जाने की याचना कर रहे हैं, (ताकि निरन्तर मीन वृति से श्रीप्रियाजी का रूप रस पान करने के लिये मिला करे, वह मेरा जीवन ही बन गया।)

