भाग बड़ौ वृन्दावन पायौ -  श्री रसिक बिहारी देव, श्री रसिक बिहारी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (03)

भाग बड़ौ वृन्दावन पायौ - श्री रसिक बिहारी देव, श्री रसिक बिहारी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (03)

(राग विहागरौ)
भाग बड़ौ वृन्दावन पायौ।
जा रज कौं सुर नर मुनि वंछित विधि संकर सिर नायौ॥ [1]
बहुतक जुग या रज बिनु बीते जन्म जन्म डहकायौ।
सो रज अब कृपा करि दीनी अभै निसान बजायौ॥ [2]
आइ मिल्यौ परिवार आपने हरि हँसि कंठ लगायौ।
स्यामा स्यामा जू बिहरत दोऊ सखी समाज मिलायौ॥ [3]
सोग संताप करौ मति कोई दाव भलौ बनि आयौ।
श्रीरसिकबिहारी की गति पाई धनि धनि लोक कहायौ॥ [4]
- श्री रसिक बिहारी देव, श्री रसिक बिहारी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (3)
 

श्रीवृन्दावन अखंड वास करनेवाले निज आश्रित जनों से श्री रसिक देव कह रहे हैं - 
हे भाई! तुमको सर्वोपरि श्रीनित्यविहारिनीजू का निज विलासरस महल श्रीवृन्दावन का अखंड वास प्राप्त हो गया है, यह तुम्हारा अहो भाग्य है।
मनुष्य, देवता एवं मुनिगण भी वृन्दावन की इस रज की वांछा करते हैं, एवं ब्रह्मा तथा भगवान शिव इस रज को माथे पर चढ़ाते हैं। [1]
 
श्री राधा के चरण कमलों से आच्छादित श्री वृंदावन की रज के बिना यह दुर्लभ मानव जीवन असंख्य बार व्यर्थ गया है।
उसी रज ने मुझ पर अब कृपा की है और मुझे सर्वोच्च आश्रय और अपार आनंद प्रदान किया है। [2]

जो वृंदावन आता है वह अपने वास्तविक सम्बन्धी अर्थात श्री श्यामा श्याम और सखियों (उनके रसिक भक्त) से मिलता है। वे सम्बन्धी खुले हाथों से हमारा स्वागत करते हैं और श्री हरि प्रसन्नता पूर्वक अपने कंठ से लगाते हैं।
श्री श्यामा श्याम नित्य ही वृंदावन के विभिन्न स्थानों में विचरण करते हैं और हमें उनके सखी (रासिकों) से मिलने में सहायता करते हैं तथा हमें उनका सहयोग प्रदान करने में भी सहायता करते हैं। [3]

इस दिव्य स्थान पर पहुंचकर, भक्तों से मिल कर और श्यामा श्यामा की कृपा और वृंदावन की रज को पाकर, किसी को भी फिर कभी दुखी नहीं होना चाहिए, क्योंकि लक्ष्य की प्राप्ति हो गयी है और अनगिनत जन्मों का आवागमन आखिरकार समाप्त हो गया है।
श्री रसिक बिहारी देव कहते हैं, "श्री बिहारीजी और बिहारिनी श्री राधारानी का प्रेम प्राप्त कर के और वृंदावन की पावन रज से युक्त होकर अपने आप को बहुत भाग्यशाली समझना चाहिए"। [4]