इस स्थान का विशेष महत्व है क्योंकि यहाँ श्री श्री रासेश्वरी (राधारानी) जी की प्रतिमा श्याम रंग (काली) रूप में उपस्थित है।
कहा जाता है कि इस जगह श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहने की वजह से, राधारानी के शरीर का रंग पूरी तरह से श्याम रंग में बदल गया। इसीलिए इस स्थान को श्री श्रीजी रासेश्वरी जी महाराज के नाम से भी जाना जाता है।
श्री हित हरिवंश रास मंडल, श्री हितहरिवंश महाप्रभु से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि हित हरिवंश महाप्रभु ने अपने जीवन का अधिकांश समय सेवा कुंज, हित रास मंडल और मदन टेर (वराह घाट) वृंदावन में बिताया।
रास मंडल में श्री हरिराम व्यास ने किशोरीजी को पायल पहनाई:
यहां रास मंडल में एक बार श्री राधा-कृष्ण रास नृत्य कर रहे थे और राधारानी की पायल टूट गई, व्यासजी (विशाखा सखी के अवतार) जो कि लीला में लीन थे, उन्होंने तुरंत अपनी तुलसी माला को गले से तोड़कर श्री प्रिया जू के चरणों में बांध दिया । वैष्णवों में से कुछ ने उनके इस व्यवहार के बारे में शिकायत की। लेकिन वह अपने निर्णय पर बहुत दृढ़ थे क्योंकि उन्होंने सुझाव दिया था कि श्री राधारानी की सेवा में इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है तो यह मेरे लिए किस काम का है। इस बात को सुनकर सब दंग रह गए।
श्री सेवक जी (दामोदरदास जी) :
श्री दामोदर दास जी जिनको सेवक जी के नाम से भी जाना जाता है, वह इसी जगह वृक्ष के नीचे बैठे हुए निकुंज लीला में पधार गए थे। ऐसा भी माना जाता है कि वह उस वृक्ष में लीन हो गए ।
श्री ध्रुवदास जी:
श्री ध्रुवदास जी: ध्रुवदास जी, श्री हित हरिवंशजी के तीसरे पुत्र, श्री गोपीनाथजी के शिष्य बने। कहा जाता है कि जब श्री ध्रुवदास जी को राधा रानी ने दर्शन दिए थे तब उनके हृदय में अपनी शक्ति दी थी जिससे उन्होंने इसी जगह पर बयालीस लीला नामक ग्रंथ लिखा जिसमें श्री राधा कृष्ण की निकुंज लीलाओं का वर्णन उन्होंने किया है।
मंदिर का समय:
गर्मी
सवेरे 6:00 बजे - मंगला आरती
शाम 7:15 बजे - शयन आरती
सर्दी
सवेरे 6:30 बजे - मंगला आरती
शाम 6:15 बजे - शयन आरती
स्थान:
हित रास मंडल, यमुना के किनारे, चीर घाट के पास स्थित है। इसको बड़ा रास मंडल भी कहते हैं।
कहा जाता है कि इस जगह श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहने की वजह से, राधारानी के शरीर का रंग पूरी तरह से श्याम रंग में बदल गया। इसीलिए इस स्थान को श्री श्रीजी रासेश्वरी जी महाराज के नाम से भी जाना जाता है।
श्री हित हरिवंश रास मंडल, श्री हितहरिवंश महाप्रभु से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि हित हरिवंश महाप्रभु ने अपने जीवन का अधिकांश समय सेवा कुंज, हित रास मंडल और मदन टेर (वराह घाट) वृंदावन में बिताया।
रास मंडल में श्री हरिराम व्यास ने किशोरीजी को पायल पहनाई:
यहां रास मंडल में एक बार श्री राधा-कृष्ण रास नृत्य कर रहे थे और राधारानी की पायल टूट गई, व्यासजी (विशाखा सखी के अवतार) जो कि लीला में लीन थे, उन्होंने तुरंत अपनी तुलसी माला को गले से तोड़कर श्री प्रिया जू के चरणों में बांध दिया । वैष्णवों में से कुछ ने उनके इस व्यवहार के बारे में शिकायत की। लेकिन वह अपने निर्णय पर बहुत दृढ़ थे क्योंकि उन्होंने सुझाव दिया था कि श्री राधारानी की सेवा में इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है तो यह मेरे लिए किस काम का है। इस बात को सुनकर सब दंग रह गए।
श्री सेवक जी (दामोदरदास जी) :
श्री दामोदर दास जी जिनको सेवक जी के नाम से भी जाना जाता है, वह इसी जगह वृक्ष के नीचे बैठे हुए निकुंज लीला में पधार गए थे। ऐसा भी माना जाता है कि वह उस वृक्ष में लीन हो गए ।
श्री ध्रुवदास जी:
श्री ध्रुवदास जी: ध्रुवदास जी, श्री हित हरिवंशजी के तीसरे पुत्र, श्री गोपीनाथजी के शिष्य बने। कहा जाता है कि जब श्री ध्रुवदास जी को राधा रानी ने दर्शन दिए थे तब उनके हृदय में अपनी शक्ति दी थी जिससे उन्होंने इसी जगह पर बयालीस लीला नामक ग्रंथ लिखा जिसमें श्री राधा कृष्ण की निकुंज लीलाओं का वर्णन उन्होंने किया है।
मंदिर का समय:
गर्मी
सवेरे 6:00 बजे - मंगला आरती
शाम 7:15 बजे - शयन आरती
सर्दी
सवेरे 6:30 बजे - मंगला आरती
शाम 6:15 बजे - शयन आरती
स्थान:
हित रास मंडल, यमुना के किनारे, चीर घाट के पास स्थित है। इसको बड़ा रास मंडल भी कहते हैं।

