प्रानहूँ ते प्यारी सुकुमारी जू कौं देखत - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (51)

प्रानहूँ ते प्यारी सुकुमारी जू कौं देखत - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (51)

(कवित्त)
प्रानहूँ ते प्यारी सुकुमारी जू कौं देखत,
बिहारी जू कें ‘रौंम-रौंम' लोचन ह्वै जात हैं। [1]
ज्यौं-ज्यौं रूप पान करैं निमिष न चैन धरै,
त्यौं-त्यौं प्यास बाढ़ै अति क्यौं हू न अघात हैं॥ [2]
छबि के तंरगनि में झूलत किसोर पिय,
हारत न हेरि-हेरि खरे ललचात हैं। [3]
'हित ध्रुव' आरतमै भयौ भ्रम चाहत ही,
मिलै हैं कि नाहिं मन क्यौं हू न पत्यात है॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (51)

अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी सुकुमारी प्रिया के मञ्जुल रूप और लावण्य का दर्शन करके प्रियतम अपने रूप-दर्शन की पिपासा को रोकने में असमर्थ हो जाते हैं। उनका रोम-रोम नेत्र बनकर प्रिया की रूप-सुधा का पान करने में तत्पर हो जाता है। [1]

जितना वे उनकी रूप-माधुरी का पान करते हैं, उनकी रूप-दर्शन की प्यास उतनी ही बढ़ती जाती है, और एक क्षण का भी अंतराय असह्य हो जाता है। वे किसी प्रकार भी तृप्ति का अनुभव नहीं कर पाते। [2]

ललित किशोर प्रियतम का मन सदैव प्रिया की छवि की तरंगों में झूला करता है। वे प्रिया के वक्षस्थल पर विराजित हारावली को देखकर लालसा युक्त होकर ललचाते रहते हैं। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रियतम का मन रूपाभिलाषा से आर्त्त हो गया है। उन्हें विश्वास नहीं हो पाता कि वे दोनों सदा के संग हैं, और उनका चित्त इस भ्रम में पड़ जाता है कि क्या हम दोनों अभी मिले भी हैं या नहीं। [4]