(राग गौरी)
रसभरे राजत रसिकबहारी |
गौर स्याम अभिराम रूप दोऊ नव नेह विहारी |
यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित, प्रान करै बलिहारी |
भगवतरसिक पियत या रस को और लगै सब खारी ||
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.6)
यहाँ श्यामा श्याम ही रसिकबिहारी है। वे रस भरे हैं। वे नव नव नेह भरे खेल खेलते हैं। उनके सुख से सखियाँ प्रमोदित हैं। भगवतरसिक जी इस रस का पान कर तृप्त हो रहे हैं और इसके सामने ओर सभी रस उन्हें खारे लगते हैं।
रसभरे राजत रसिकबहारी |
गौर स्याम अभिराम रूप दोऊ नव नेह विहारी |
यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित, प्रान करै बलिहारी |
भगवतरसिक पियत या रस को और लगै सब खारी ||
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.6)
यहाँ श्यामा श्याम ही रसिकबिहारी है। वे रस भरे हैं। वे नव नव नेह भरे खेल खेलते हैं। उनके सुख से सखियाँ प्रमोदित हैं। भगवतरसिक जी इस रस का पान कर तृप्त हो रहे हैं और इसके सामने ओर सभी रस उन्हें खारे लगते हैं।

