कहि न परै सोभा या सुख की - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (14)

कहि न परै सोभा या सुख की - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (14)

कहि न परै सोभा या सुख की  |
मेंरे नैननि कौ सरबस धन जीऊँ, देखि-देखि दुति मुख की  | |

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (14)

 हे सखी ! मेरी यह प्रार्थना है कि ये लाल ललना उपरोक्त इसी अद्रभुत रस कि वर्षा करते रहें। और हम सब इनके मुखारबिंद की रूप माधुरी को देख देख कर जिया करें। इन दोनो की इस समय की सुख की शोभा को मैं क्या वर्णन करू? मेंरे नेत्रों का तो यही सर्वस्व धन है। मैं यह प्रार्थना करती हूँ कि इनके मुखारबिंद की शोभा देख देख कर ही जिया करू। इसके अतिरिक्त मेंरे ह्रदय मे और कोई अभिलाषा नहीं है। मैं एक मात्र यही चाहती हूँ कि इनके रुख को ही देख कर इनकी सेवा में लगी रहूँ और ये दोनों सुरति जन्म अद्रभुत अमृत रस की वर्षा निशिदिन करते रहें ।