जात जात मैं सब - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (20)

जात जात मैं सब - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (20)

जात जात मैं सब, सबही जात कुजात।
रसिक अनन्य अजात की, कहौ कौन सी जात॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (20)

संसार के सभी लोग अपनी-अपनी जातियों और कुलों के अभिमान में बहते जा रहे हैं। कोई उत्तम जाति का होने का गर्व करता है, तो कोई किसी और कुल का। परंतु जो अनन्य रसिक जन हैं, जिन्होंने स्वयं को श्री प्रिया-प्रियतम के चरणों में समर्पित कर दिया है, वे तो इन लौकिक जातियों से परे 'अजात' (जाति-विहीन) हो चुके हैं। भला उस दिव्य रसिक की कौन सी जाति हो सकती है, जिसका एकमात्र परिचय केवल श्यामा-श्याम है?