(राग खिमटासिंधुका)
सोय सोय सबकाम विगारा |
गौरशयामरसरूप न चाखा जुगुललाल अस नाम विसारा ||
ललितकिशोरी श्रीवृन्दावन सो धनहूँ ना चित्त सम्हारा |
चेत चेत वे मूरख मनुआं जीती वाजी जाता हारा ||
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (२५०)
अरे मन ! आप अनंत काल से अज्ञानता की नींद में सो रहे हैं और आपने अपना भविष्य खराब कर लिया है। अरे मन ! यह दुर्लभ अवसर जा रहा है और आप गौर श्याम युगल रस के अमृत को नहीं चख पा रहे हैं, यानी वृंदावन के आनंद को, और न ही आप दिव्य युगल के नाम (युगल नाम) का अमृत पी सकते हैं। अरे मन ! न तो आप सभी अमृत के खजाने का अनुभव कर पाए, न ही श्री वृंदावन धाम और न ही आप श्री श्यामा श्याम के रास रुपी खजाने का ध्यान कर पाए। श्री ललित किशोरी कहते हैं, अरे मन ! चूंकि आपको भगवान की परम कृपा से मानव जीवन मिला है और आप इस जीती हुई बाजी को हारे जा रहे है।
सोय सोय सबकाम विगारा |
गौरशयामरसरूप न चाखा जुगुललाल अस नाम विसारा ||
ललितकिशोरी श्रीवृन्दावन सो धनहूँ ना चित्त सम्हारा |
चेत चेत वे मूरख मनुआं जीती वाजी जाता हारा ||
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (२५०)
अरे मन ! आप अनंत काल से अज्ञानता की नींद में सो रहे हैं और आपने अपना भविष्य खराब कर लिया है। अरे मन ! यह दुर्लभ अवसर जा रहा है और आप गौर श्याम युगल रस के अमृत को नहीं चख पा रहे हैं, यानी वृंदावन के आनंद को, और न ही आप दिव्य युगल के नाम (युगल नाम) का अमृत पी सकते हैं। अरे मन ! न तो आप सभी अमृत के खजाने का अनुभव कर पाए, न ही श्री वृंदावन धाम और न ही आप श्री श्यामा श्याम के रास रुपी खजाने का ध्यान कर पाए। श्री ललित किशोरी कहते हैं, अरे मन ! चूंकि आपको भगवान की परम कृपा से मानव जीवन मिला है और आप इस जीती हुई बाजी को हारे जा रहे है।

