कुसुम सरोवर तक का स्थल उद्धव जी का स्थल कहा जाता है । कुसुम सरोवर के इस पार और उस पार दोनों ओर उद्धव जी का मंदिर है । समीप ही है – उद्धव कुण्ड ।
उद्धव जी एक दिन के लिए ब्रज मे आए थे की गोपियों को उद्बोधित कर लौट जायेंगे किन्तु ब्रज का स्वरुप एवं गोपियों के ह्रदय का दिव्य प्रेम तथा श्री राधारानी के दर्शन कर वे श्री कृष्ण को भूल गए, ज्ञान का दिव्य अम्बर फट कर गुदड़ी बन गया और 6 महीने ब्रज में ही रहे । तब एक दिन श्री राधारानी ने उद्धव जी को आज्ञा की "उद्धव ! तुम्हारे सखा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे, तुम्हें गमन भी करना है ।" ऐसा कह कर श्री राधारानी ने उद्धव जी को आशीष प्रदान किया । श्री राधारानी की आज्ञा से न चाहते हुए भी उद्धव जी ने प्रणाम कर प्रस्थान किया । लौटते समय उद्धव जी ने कामना की -
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनां ॥
- श्रीमद्भागवत (10.47.61)
"ओह! मैं वृन्दावन की इन झाडिय़ों, लताओं तथा जड़ी-बूटियों में से कोई एक भी होने का सौभाग्य प्राप्त करूँ क्योंकि गोपियाँ उन्हें अपने चरणों से रौंदती हैं और अपने चरणकमलों की धूल से उन्हें आशीर्वाद देती हैं ।"
स्कन्दपुराण के श्रीमद्भागवत-माहात्म्य प्रसंग में इसका बड़ा ही रोचक वर्णन है। वज्रनाभ महाराज ने शाण्डिल्य आदि ऋषियों के आनुगत्य में यहाँ उद्धव कुण्ड का प्रकाश किया । उद्धव जी यहाँ पास में ही गोपियों की चरण धूलि में अभिषिक्त होने के लिए तृण-गुल्म के रूप में सदैव निवास करते हैं । श्रीकृष्ण की लीला अप्रकट होने पर कृष्ण की द्वारका वाली पटरानियाँ बड़ी दुःखी थीं । एक बार वज्रनाभजी उनको साथ लेकर यहाँ उपस्थित हुए । बड़े जोरों से संकीर्तन आरम्भ हुआ । देखते-देखते उस महासंकीर्तन में कृष्ण के सभी परिकर क्रमशः आविर्भूत होने लगे । अर्जुन मृदंग वादन करते हुए नृत्य करने लगे । इस प्रकार द्वारका के सभी परिकर उस संकीर्तन मण्डल में नृत्य और कीर्तन करने लगे । हठात् महाभागवत उद्धव भी वहाँ के तृण-गुल्म से आविर्भूत होकर नृत्य में विभोर हो गये । फिर भला कृष्ण ही कैसे रह सकते थे? श्रीमती राधिका आदि सखियों के साथ वे भी उस महासंकीर्तन रास में आविर्भूत हो गये । थोड़ी देर के बाद ही वे अंतर्ध्यान हो गये । इस प्रकार उद्धव जी ने द्वारका की महिषियों को इस स्थान पर सांत्वना दी थी ।
स्थान :
कुसुम सरोवर, गोवर्धन के ठीक पश्चिम में परिक्रमा मार्ग पर दाहिनी ओर उद्धव कुण्ड स्थित है ।
उद्धव जी एक दिन के लिए ब्रज मे आए थे की गोपियों को उद्बोधित कर लौट जायेंगे किन्तु ब्रज का स्वरुप एवं गोपियों के ह्रदय का दिव्य प्रेम तथा श्री राधारानी के दर्शन कर वे श्री कृष्ण को भूल गए, ज्ञान का दिव्य अम्बर फट कर गुदड़ी बन गया और 6 महीने ब्रज में ही रहे । तब एक दिन श्री राधारानी ने उद्धव जी को आज्ञा की "उद्धव ! तुम्हारे सखा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे, तुम्हें गमन भी करना है ।" ऐसा कह कर श्री राधारानी ने उद्धव जी को आशीष प्रदान किया । श्री राधारानी की आज्ञा से न चाहते हुए भी उद्धव जी ने प्रणाम कर प्रस्थान किया । लौटते समय उद्धव जी ने कामना की -
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनां ॥
- श्रीमद्भागवत (10.47.61)
"ओह! मैं वृन्दावन की इन झाडिय़ों, लताओं तथा जड़ी-बूटियों में से कोई एक भी होने का सौभाग्य प्राप्त करूँ क्योंकि गोपियाँ उन्हें अपने चरणों से रौंदती हैं और अपने चरणकमलों की धूल से उन्हें आशीर्वाद देती हैं ।"
स्कन्दपुराण के श्रीमद्भागवत-माहात्म्य प्रसंग में इसका बड़ा ही रोचक वर्णन है। वज्रनाभ महाराज ने शाण्डिल्य आदि ऋषियों के आनुगत्य में यहाँ उद्धव कुण्ड का प्रकाश किया । उद्धव जी यहाँ पास में ही गोपियों की चरण धूलि में अभिषिक्त होने के लिए तृण-गुल्म के रूप में सदैव निवास करते हैं । श्रीकृष्ण की लीला अप्रकट होने पर कृष्ण की द्वारका वाली पटरानियाँ बड़ी दुःखी थीं । एक बार वज्रनाभजी उनको साथ लेकर यहाँ उपस्थित हुए । बड़े जोरों से संकीर्तन आरम्भ हुआ । देखते-देखते उस महासंकीर्तन में कृष्ण के सभी परिकर क्रमशः आविर्भूत होने लगे । अर्जुन मृदंग वादन करते हुए नृत्य करने लगे । इस प्रकार द्वारका के सभी परिकर उस संकीर्तन मण्डल में नृत्य और कीर्तन करने लगे । हठात् महाभागवत उद्धव भी वहाँ के तृण-गुल्म से आविर्भूत होकर नृत्य में विभोर हो गये । फिर भला कृष्ण ही कैसे रह सकते थे? श्रीमती राधिका आदि सखियों के साथ वे भी उस महासंकीर्तन रास में आविर्भूत हो गये । थोड़ी देर के बाद ही वे अंतर्ध्यान हो गये । इस प्रकार उद्धव जी ने द्वारका की महिषियों को इस स्थान पर सांत्वना दी थी ।
स्थान :
कुसुम सरोवर, गोवर्धन के ठीक पश्चिम में परिक्रमा मार्ग पर दाहिनी ओर उद्धव कुण्ड स्थित है ।

