एक बार चैतन्य महाप्रभु राधा कृष्ण के चिंतन युक्त वृंदावन की परिक्रमा पर थे, और वह गोवर्धन के पास से हो कर परिक्रमा कर रहे थे । कुछ आगे बढ़ने पर चैतन्य महाप्रभु जी ने देखा आमने-सामने वृक्ष की डालियों पर शुक सारी परस्पर प्रेम-कलह करते हुए श्री राधा कृष्ण युगल का गुणगान कर रहे हैं।
शुक - मेरे कृष्ण मदनमोहन हैं।
सारी - मेरी राधा उनके वाम भाग में हैं अन्यथा वे केवल मदन ही हैं।
शुक - मेरे कृष्ण ने गिरिराज को धारण किया था।
सारी - क्योंकि मेरी राधा ने उनमें शक्ति का संचार किया था। अन्यथा
धारण कैसे करें?
शुक - मेरे कृष्ण जगत के जीवन हैं।
सारी - मेरी राधा इस जीवन की भी जीवन हैं।
शुक - मेरे कृष्ण के सिर पर मयूर-पंख सुशोभित है।
सारी - क्योंकि मेरी राधा का नाम उसमें अंकित है।
शुक - मेरे कृष्ण के सिर पर मोर-पंख बायीं ओर झुका हुआ है।
सारी - क्योंकि वह मेरी राधा के चरणों में रखना चाहतें हैं।
शुक - मेरे कृष्ण चन्द्र हैं।
सारी - मेरी राधा चन्द्र पकड़ने का फंद हैं।
शुक ने कहा कलह की आवश्यकता नहीं। दोनों मिलकर युगल किशोर का गुणगान करेंगे। सारी ने कहा मुझे सहर्ष स्वीकार है। शुक और सारी की प्रेम कलह देखकर चैतन्य महाप्रभु प्रेम विभोर होकर श्री राधा कृष्ण का गुणगान करने लगे ।

