नौतन वैस किसोर छबि, बसति है जिहि उर नित्त।
पौगंड बाल लीलादिहु, भावत नहिं तेहि चित्त॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (59)
जिस रसिक भक्त के हृदय में नव किशोर वपु श्री लाडिली-लाल सदैव विराजते हैं, उसके चित्त में तो श्री कृष्ण की पौगण्ड, बाल-लीला आदि की भी विशेष रूचि नहीं रह जाती।
पौगंड बाल लीलादिहु, भावत नहिं तेहि चित्त॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (59)
जिस रसिक भक्त के हृदय में नव किशोर वपु श्री लाडिली-लाल सदैव विराजते हैं, उसके चित्त में तो श्री कृष्ण की पौगण्ड, बाल-लीला आदि की भी विशेष रूचि नहीं रह जाती।

