सुनि मेरो वचन छबीली राधा, तैं पायो रस सिंधु अगाधा -  श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री हित चतुरासी (98)

सुनि मेरो वचन छबीली राधा, तैं पायो रस सिंधु अगाधा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री हित चतुरासी (98)

(राग आसावरी)
सुनि मेरो वचन छबीली राधा, तैं पायो रस सिंधु अगाधा ।।
तूँ वृषभानु गोप की बेटी, मोहनलाल रसिक हँसि भेंटी ।
जाहि बिरंचि उमापति नाये, तापै तैं बन फूल बिनाये ।।
जो रस नेति-नेति श्रुति भाख्यो, ताकौ तैं अधर सुधारस चाख्यौ ।
तेरौ रूप कहत नहीं आवै, जै श्रीहित हरिवंश कछुक जस गावै ।

- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री हित चतुरासी (18)

भावार्थ- "हे छविमयी राधे ! तू मेरी बात सुन ! तूने रस का गम्भीर समुद्र पाया है । यद्यपि तू वृषभानु गोप की ही बेटी है, फिर भी तूने प्रसन्नता पूर्वक रसिक मोहन लाल का आलिंगन किया है, जिन श्रीकृष्ण का नमन ब्रह्म और उमापति शङ्कर भी करते है, तूने उन्हों से फूल विनाये (चुनवाये) हैं । आरी ! जिस श्रीकृष्ण (परम पुरुष भगवान) के रस (लीला, प्रभाव, गुण माहात्म्य आदि) के लिये श्रुतियों ने भी (असमर्थता पूर्वक) नेति नेति कह दिया तूने तो उसका भी अधर रस पान किया है। राधे ! तेरा रूप तो कुछ कहने में ही नहीं आता, हित हरिवंश तो तेरा कुछ थोड़ा सा सुयश मात्र ही गा रहा है |