वृन्दावन सत करन कौं, कीन्हौं मन उत्साह।
नवल राधिका कृपा बिनु, कैसैं होत निबाह॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (03)
मेरे मन में श्री वृन्दावन-शतक (एवं रस) की रचना का उत्साह उत्पन्न हुआ है, किंतु नवल श्री राधिकाजी की कृपा के बिना इसका निर्वाह संभव नहीं है।

