(कवित्त)
नवल नवेली अलबेली सुकुमारी जू कौ,
रूप पिय-प्राननिं कौ सहज अहार री। [1]
बिंजन सुभाइनि के नेह घृत सौं जु बने,
रोचक रुचिर हैं अनूप अति चारु री॥ [2]
नैननिं की रसना तृपित न होती क्यौंहूँ,
नई-नई रूचि 'ध्रुव' बढ़ति अपार री। [3]
पानिप कौ पानी प्याइ पान मुसिक्यान ख्वाइ,
राखे उर सेज स्वाइ पायौ सुख सार री॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (50)
नित्य नवल रूप-लावण्य से युक्त, अलबेली अति कोमलांगी प्रिया का रूप ही प्रियतम के प्राणों का पोषक आहार है। [1]
उनके इस रूप में भाव-भंगिमाओं की अभिव्यक्ति प्रेम-घृत से निर्मित है, जो रुचिकर, सुंदर, महामधुर, और सुस्वादु है। [2]
जिसका नित्य आस्वादन करते हुए भी प्रियतम की नेत्ररूपी जिह्वा कभी तृप्ति का अनुभव नहीं करती, बल्कि निरंतर नवीन विशेष रुचि का संवर्धन करती रहती है। [3]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जब प्रिया ने रूप-लावण्य का जल पिलाकर और मुस्कानरूपी ताम्बूल बीटिका अर्पित कर प्रियतम को अपने हृदय-शय्या पर शयन कराया, तब उन्होंने समस्त सुखों के सार का अनुभव किया। [4]
नवल नवेली अलबेली सुकुमारी जू कौ,
रूप पिय-प्राननिं कौ सहज अहार री। [1]
बिंजन सुभाइनि के नेह घृत सौं जु बने,
रोचक रुचिर हैं अनूप अति चारु री॥ [2]
नैननिं की रसना तृपित न होती क्यौंहूँ,
नई-नई रूचि 'ध्रुव' बढ़ति अपार री। [3]
पानिप कौ पानी प्याइ पान मुसिक्यान ख्वाइ,
राखे उर सेज स्वाइ पायौ सुख सार री॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (50)
नित्य नवल रूप-लावण्य से युक्त, अलबेली अति कोमलांगी प्रिया का रूप ही प्रियतम के प्राणों का पोषक आहार है। [1]
उनके इस रूप में भाव-भंगिमाओं की अभिव्यक्ति प्रेम-घृत से निर्मित है, जो रुचिकर, सुंदर, महामधुर, और सुस्वादु है। [2]
जिसका नित्य आस्वादन करते हुए भी प्रियतम की नेत्ररूपी जिह्वा कभी तृप्ति का अनुभव नहीं करती, बल्कि निरंतर नवीन विशेष रुचि का संवर्धन करती रहती है। [3]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जब प्रिया ने रूप-लावण्य का जल पिलाकर और मुस्कानरूपी ताम्बूल बीटिका अर्पित कर प्रियतम को अपने हृदय-शय्या पर शयन कराया, तब उन्होंने समस्त सुखों के सार का अनुभव किया। [4]

