श्री भगवत उर धारी, भक्ति करि मन को दाबै।
गुरु आज्ञा अनुकूल रहै, नहीं वेदन खावै॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (11)
जो व्यक्ति श्री हरि को हृदय-स्थल में विराजमान कर उनकी सच्ची भक्ति करता है और मन को वश में रखकर गुरु की आज्ञा के अनुसार चलता है, उसे संसार की कोई वेदना भोगनी नहीं पड़ती।

