परस्पर दोउ चकोर, दोउ चंदा - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (6)

परस्पर दोउ चकोर, दोउ चंदा - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (6)

परस्पर दोउ चकोर, दोउ चंदा |
दोउ चातक, दोउ स्वाति,दोउ घन, दोउ दामिनी अमंदा ||
दोउ अरबिंद, दोउ अलि लंपट, दोउ लोहा दोउ चुबंक |
दोउ आसक, महबूब दोउ मिलि, जुरे जुराफा अंबक ||
दोउ मुदार, दोउ मोर, दोउ मृग, दोउ राग रस भीने |
दोउ मनि बिसद, दोउ बर पन्नग, दोउ बारि दोउ मीने ||
भगवतरसिक बिहारिन प्यारी रसिकबिहारी प्यारे |
दोउ मुख देखि जियत, अधरामृत पियत, होत नहि न्यारे ||

- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (6)

भावार्थ - भगवतरसिकजी कहते है कि रसिकबिहारी प्रियतम और रसिक बिहारिणी श्रीप्रियाजी - दोनों एक दूसरे के लिए चकोर है और दोनों ही चन्द्रमा हैं। दोनों ही चातक हैं और दोनों ही स्वाति वृष्टि हैं। दोनों ही मेघ हैं और दोनों ही ज्योतिर्मयी दामिनी हैं। दोनों ही कमल हैं और दोनों ही रसास्वादी भ्रमर हैं, दोनों ही लोहा हैं और दोनों ही चुम्बक हैं। दोनों ही प्रेमी हैं और दोनों ही प्रेम पात्र हैं। दोनों मिलकर जुराफ दंपति के नेत्रों की भाँति सदा जुड़े रहते हैं । ये दोनों ही मोर है और दोनों ही मुदारशिला हैं। दोनों ही मृग हैं और दोनों ही रसभीने राग हैं। दोनों ही उज्जल मणि हैं और दोनों ही मणिधर (नाग) हैं। दोनों ही जल हैं और दोनों ही मीन हैं। दोनों की आसक्ति एक दूसरे के प्रति बराबर हैं। ये दोनों प्रिया प्रियतम एक दूसरे का मुख देखकर जीते हैं, अधरामृत पीते हैं और कभी एक दूसरे से अलग नहीं होते ।।६।।