यद् वृन्दावन मात्र गोचरमहो यन्न श्रुतीकं शिरो,
प्यारोढूं क्षमते न यच्छिव शुकादीनां तु यद् ध्यानगम्।
यत्प्रेमामृत माधुरी रसमयं यन्नित्य कैशोरकं,
तद्रूपं परिवेष्टुमेव नयनं लोलायमानं मम ॥
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (76)
अहो जो केवल श्रीवृन्दावन में ही दृष्टिगोचर होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जिसका वर्णन करने में श्रुति-शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं। जो शिव और शुक आदि के भी ध्यान में नहीं आता, जो प्रेमामृत-माधुरी से परिपूर्ण है और जो नित्य किशोर हैं । उस रूप को देखने के लिये मेरे नेत्र खोजते फिरते हैं -चञ्चल हो रहे हैं।

