भगवत रसिक संग जो चाहै, प्रथमहै लोभै त्यागै - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (05)

भगवत रसिक संग जो चाहै, प्रथमहै लोभै त्यागै - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (05)

भगवत रसिक संग जो चाहै, प्रथमहै लोभै त्यागै |
देह, गेह, सुत, सम्पति, द्वारा तब हरी सौं अनुरागै ||

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (05)

श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि जो साधक परम रसिक श्रीयुगल की नित्य संगति के अभिलाशी हैं, उन्हें सर्वप्रथम लोभ का परित्याग कर देना चाहिये, फिर शरीर, घर, पुत्र, धन, दौलत, स्त्री आदि के प्रति अनासक्त होकर हरी से प्रेम करना चाहिए |