प्रेमोल्लासैकसीमा परम रसचमत्कार वैचित्र्य सीमा,
सौन्दर्य्यस्यैक-सीमा किमपि नव-वयो-रूप-लावण्य सीमा ।
लीला-माधुर्य्य सीमा निजजन परमोदार वात्सल्य सीमा,
सा राधा सौख्य-सीमा जयति रतिकला-केलि-माधुर्य्य-सीमा ॥
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (130)
प्रेमोल्लास की चरम सीमा, परम रस( प्रेम) चमत्कार विचित्रता की सीमा, सौन्दर्य्य की अंतिम सीमा, अनिर्वचनीय नवीन वय, रूप एवं लावण्य की सीमा; निजजनों के प्रति परम उदारता एवं वात्सल्यता की सीमा, लीला-माधुर्य्य की सीमा, रति-कला-केलि-माधुरी की सीमा एवं सुख की परम सीमा केवल और केवल श्रीराधा ही सर्वोत्कृष्टता को प्राप्त हैं।
सौन्दर्य्यस्यैक-सीमा किमपि नव-वयो-रूप-लावण्य सीमा ।
लीला-माधुर्य्य सीमा निजजन परमोदार वात्सल्य सीमा,
सा राधा सौख्य-सीमा जयति रतिकला-केलि-माधुर्य्य-सीमा ॥
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (130)
प्रेमोल्लास की चरम सीमा, परम रस( प्रेम) चमत्कार विचित्रता की सीमा, सौन्दर्य्य की अंतिम सीमा, अनिर्वचनीय नवीन वय, रूप एवं लावण्य की सीमा; निजजनों के प्रति परम उदारता एवं वात्सल्यता की सीमा, लीला-माधुर्य्य की सीमा, रति-कला-केलि-माधुरी की सीमा एवं सुख की परम सीमा केवल और केवल श्रीराधा ही सर्वोत्कृष्टता को प्राप्त हैं।

