अलबेले आँगन खरे, अंस अंस भुज धारि।
लै दरपन दिखरावहीं, ह्वै सन्मुख सहचारी॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सेवा सुख (18)
अलबेले रसिक दम्पति श्री राधा-कृष्ण परस्पर गलबहियाँ दिए हुए निकुंज महल के आँगन में खड़े हैं और सहचरी दर्पण दिखला रही है।
लै दरपन दिखरावहीं, ह्वै सन्मुख सहचारी॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सेवा सुख (18)
अलबेले रसिक दम्पति श्री राधा-कृष्ण परस्पर गलबहियाँ दिए हुए निकुंज महल के आँगन में खड़े हैं और सहचरी दर्पण दिखला रही है।

