दूल्ह नित्य विहार है - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (370)

दूल्ह नित्य विहार है - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (370)

दूल्ह नित्य विहार है, और औतार बारात।
ए विलसैं नित सार सुख, वे विलसैं ज्यौं जात॥

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (370)

जैसे विवाह में एकमात्र दुल्हा-दुल्हन का ही मान-सम्मान और गौरव होता है और उन्हें ही सब निहारते हैं, वैसे ही रसिकों द्वारा रसोपासना-पद्धति में निज महल का नित्य विहार ही सर्वशिरोमणि रस है और अन्य अवतारों के सुख एवं रस को तो ऐसे जानो जैसे नित्य विहार के सामने विवाह में बारातियों को प्राप्त होने वाला सुख-सम्मान।