उन्मीलनमुकुटच्छटा परिल सच्छिकच्रकवालं स्फुरत, केयूराँग दहार कंकणघटा निर्धूत रत्नच्छवि ।
श्रोणी-मण्डल किंकणी कलरवं मञ्जीर-मञ्जुध्वनिं, श्री मतपादसरोरुहं भज मनो राधाभिधानं मह :।।
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (120)
मेरे मन तू तो श्री ‘राधा’ नामक ज्योति का ही भजन कर जिनके देदीप्यमान मुकुट की छटा से दिशा-मण्डल विलसित हो रहा है । जो केयूर, अङ्गद, हार और कड्कणो की छटा से रत्नों की शोभा को परास्त कर रही हैं । जिसमें नितम्ब-मण्डल को किंकणियों का कलरव हो रहा है। एवं चरण-कमलों के नूपुरों की मधुर ध्वनि शब्दित हो रही है।
श्रोणी-मण्डल किंकणी कलरवं मञ्जीर-मञ्जुध्वनिं, श्री मतपादसरोरुहं भज मनो राधाभिधानं मह :।।
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (120)
मेरे मन तू तो श्री ‘राधा’ नामक ज्योति का ही भजन कर जिनके देदीप्यमान मुकुट की छटा से दिशा-मण्डल विलसित हो रहा है । जो केयूर, अङ्गद, हार और कड्कणो की छटा से रत्नों की शोभा को परास्त कर रही हैं । जिसमें नितम्ब-मण्डल को किंकणियों का कलरव हो रहा है। एवं चरण-कमलों के नूपुरों की मधुर ध्वनि शब्दित हो रही है।

