हमारी अलबेली सरकार,
रसिक रंगीली, गुण गरबीली, रसिकन की रिझवार।
विधि निषेद, मर्यादा वेद की, रहती न एहि दरबार ।।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा मधुरी (53)
हमारी स्वामिनी, अलबेली सरकार, श्री राधारानी दिव्य प्रेम-आनंद की अंतिम सीमा है। रसिकों के लिए आनंद का एक स्रोत, वह सभी महान गुणों का भंडार है और जिनसे रसिकों का दिल हमेशा प्रसन्न रहता है। साधना में किसी विधि का, वेदों की मर्यादा (वेदों की आज्ञा) का इनके दरबार में कोई मतलब नहीं है।
रसिक रंगीली, गुण गरबीली, रसिकन की रिझवार।
विधि निषेद, मर्यादा वेद की, रहती न एहि दरबार ।।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा मधुरी (53)
हमारी स्वामिनी, अलबेली सरकार, श्री राधारानी दिव्य प्रेम-आनंद की अंतिम सीमा है। रसिकों के लिए आनंद का एक स्रोत, वह सभी महान गुणों का भंडार है और जिनसे रसिकों का दिल हमेशा प्रसन्न रहता है। साधना में किसी विधि का, वेदों की मर्यादा (वेदों की आज्ञा) का इनके दरबार में कोई मतलब नहीं है।

