यत्र-यत्र मम जन्म कर्मभिर्नारकेऽथ परमे पदेऽथवा।
राधिका-रति-निकुञ्ज-मण्डली तत्र-तत्र हृदि मे विराजताम् ॥
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (267)
कर्मवशतः नरक में अथवा स्वर्ग में जहां जहाँ मेरा जन्म हो अथवा परम पद में ही क्यों न चला जाऊँ किन्तु वहाँ-वहाँ श्रीराधा केलि निकुञ्ज मण्डली [श्रीप्रिया, प्रियतम, सहचरि और वृन्दावन ] मेरे हृदय में विराजमान रहे।
राधिका-रति-निकुञ्ज-मण्डली तत्र-तत्र हृदि मे विराजताम् ॥
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (267)
कर्मवशतः नरक में अथवा स्वर्ग में जहां जहाँ मेरा जन्म हो अथवा परम पद में ही क्यों न चला जाऊँ किन्तु वहाँ-वहाँ श्रीराधा केलि निकुञ्ज मण्डली [श्रीप्रिया, प्रियतम, सहचरि और वृन्दावन ] मेरे हृदय में विराजमान रहे।

