धरो मन ! युगल माधुरी ध्यान - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल-माधुरी (06)

धरो मन ! युगल माधुरी ध्यान - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल-माधुरी (06)

धरो मन ! युगल माधुरी ध्यान,
रिझवत नित निकुंज श्यामा कहँ, मरम न सक कोउ जान।
यह ‘कृपालु’ रस रसिकहिं जानत, जो नित कर रह पान ।।

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल-माधुरी (06)

अरे मन ! तू प्रिया-प्रियतम की रूपमाधुरी का निरंतर ही ध्यान किया कर | रसिकों के सिद्धांत के अनुसार लीला-विलास के क्षेत्र में श्यामसुन्दर दास हैं, तथा नित्य ही निकुंजों के मध्य में विविध प्रकार से किशोरी जी को रिझाया करते हैं | इस मर्म को रसिकों के सिवा और कोई भी नहीं जान सकता | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि इस निकुंज रस-माधुरी को रसिक ही जानते हैं, जो कि इस रस का निरन्तर ही पान किया करते हैं |