कुंजनि के आँगन में जहाँ-जहाँ पग धरैं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (21)

कुंजनि के आँगन में जहाँ-जहाँ पग धरैं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (21)

(कवित्त)
कुंजनि के आँगन में जहाँ-जहाँ पग धरैं,
छबि के बिछौना से बिछाये तहाँ जात है। [1]
रंगभरी लाडिली निपट अलबेली भाँति,
अलबेले लोइन न कैंहूँ ठहरात हैं॥ [2]
नई-नई माधुरी कौ सार है शुभाइनि में ,
मुसकनि मानौं सुख-फूल बिगसात हैं। [3]
सोंधे की सी बास 'ध्रुव' फैलि रही पाहिलैं ही,
रूपनिधि पानिप के पुंज बरसात हैं॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (21)

श्री वृन्दावन के विविध निकुंजों और प्रांगणों में नवल लाडिली जहाँ-जहाँ पदन्यास करती हैं, वहाँ अपनी छवि के आस्तरण से सजाती जाती हैं। [1]

रसरंग भरी लाडिली, जिनकी लीला-गति परम अद्भुत है, और जिनके चपल नेत्र जैसे स्थिर होना जानते ही नहीं। [2]

जिनके हाव-भाव में नित्य नवीन माधुर्य-सार का संचार होता रहता है, और जिनका मंद स्मित मानो आनंद-कुसुम का विकास है। [3]

जिनके आगमन से पूर्व ही उनके अंगों की दिव्य गंध फैलने लगती है, और उनके आगमन पर तो मानो लावण्य-पुंज की वर्षा होने लगती है। [4]